Saturday, 2 April 2016

इस गूँजते सन्नाटे में सुनो कौन पुकारता है

इस गूँजते सन्नाटे में सुनो कौन पुकारता है
चलो बताओ यहाँ हमे कौन जानता है
जो सुबह की धूप में फिर निखर जाते हैं
देखो फूल भी समय आने पर बिखर जाते हैं
आज़ भी मैं चाँदनी-सा सोया हूँ
अपनों के बीच सूनेपन से चिपट रोया हूँ
बूढ़ा हूँ परिवार में उम्रदराज़ कहलाता है
सुबह से शाम हुई चलो कहीं टहल आता हूँ
मैं ऊँचा हूँ या सुनता हूँ न कोई बुलाता है
इस गूँजते सन्नाटे में सुनो कौन पुकारता है

चलो बताओ यहाँ हमे कौन जानता है

चलो तुम साथ तुम्हें वो सागर दिखाऊंगा

चलो तुम साथ तुम्हें वो सागर दिखाऊंगा
नशा-ए इश्क की ताकत तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगा
इक बार झूठे से ज़रा नजरें तो मिलाओ
तुम्हें शबनम से मलमल के दुल्हन मैं बनाऊंगा

किसी कान्हे की तुम राधा, या राम की सीता हो
हो कोई रामायण, या प्रेम-गीता हो
ये शब्द मेरे राग फीके अमृत भी हो कड़वा
जो साथ तेरा हो, तो फिर गीत-कविता हो
जो साथ तेरा हो, तो फिर गीत-कविता हो