Tuesday, 31 December 2013

है धन्यवाद जो साल गया और स्वागत नया साल


नया है मौसम आने वाला और नई हैं आशाएँ
चाहे नंगे पाँव चलूँ पर रंग भरी हो नई दिशाएँ
नई सुबह में, नए जोश से चलना है सूरज की ओर
नई सोच से नए दौर में, दौड़े ये है नया-सा भोर
दूर रहे हर कठनाई और खुशियों से हों मालामाल
है धन्यवाद जो साल गया और स्वागत नया साल .....है धन्यवाद जो साल गया और स्वागत नया साल

Friday, 13 December 2013

सखी तेरे लिए


खुशियों के गीत
सपनें और संगीत
मीत, प्रीत और प्रिया
दीप, जोत और दिया
सखी तेरे लिए 

खनखन को बेताब कंगन
बनने को महताब कंगन
आलंगन को राह
और मिलन को बाँह
सखी तेरे लिए

ये मौसम और बयार
बारिश की फुहार
फूल और बगीचा
आँगन और गलीचा
स्वागत में बिछने को तैयार
सखी तेरे लिए

नदी का बहता पानी
झीलों की रवानी
फूलों की गंध
और सातों रंग
प्यास की तरंग
अमावस्या-सा काज़ल
सावन का बादल
सुनने को पदचाप
मौन खड़े चुपचाप
सखी तेरे लिए

Wednesday, 11 December 2013

बेटी प्यारी पाँच साल की देख के मन मुस्काए


बेटी प्यारी पाँच साल की देख के मन मुस्काए
उसकी रोचक बातें सुनकर, दिल बच्चा बन जाए
ठुमक-ठुमक जैसे वो मटके
और चिड़िया-सी चर्फर चहके
मुझको याद दिलाता है, मेरा बचपन पाने को
मचल उठती हूँ, जीवन जंजाल हटाने को
काश, जो मैं भी बच्ची होती
पापा संग पलती होती और मम्मी संग जाती स्कूल
कोने वाले पार्क के झूले में खूब तैरती, मानो सबकुछ भूल
और भैया संग जाती फिर से नुक्कड़ वाली दूकान
ले आती कुछ पैसों में भर-भर के सामान
अब यादों का तराना और छिरने दो
याद करने दो, बस मुझे बहने दो

हाँ याद आती है बचपन से बाईस की वो सारी बातें
चाहे वो भाई का साईकल से गिरना, या बोर्ड परीक्षा की रातें
पापा का शाम को दफ्तर से घर लौटना
मम्मी के साथ हमारा भी राह ताकना
क्यूँकि कुछ बिस्किट और चाकलेट लाते थे
हम सारे भाई-बहन मिल बैठ की खाते थे
 
और भी कई बातें याद आती हैं, जो दिल को काटती हैं
वो पड़ोस वाली लीलावती अम्मा की पापा को नसीहत
की ये बेटियाँ हैं, तेरे ऊपर फज़ीहत
याद हैं वो समाज की आहें, और पापा के मजबूत कन्धों को संभालती मम्मी की बाहें
 
याद है वो जीजा जी के पापा का चेहरा सादा
पर डोली उठते ही सोनाराम के गहनों का तगादा
एक पिता होने का मतलब एक पिता ही जानते हैं
और अगली साल भाई के कॉलेज दाखिले का वादा
ये देखो मेरी शादी के एल्बम की ये अगली तस्वीर
इस कोने में पापा रुमाल से अपना चेहरा पोछ रहे हैं
शायद रुमाल में कुछ आसूं हैं जिनसे समाज के नियम धो रहे हैं.... समाज के नियम धो रहे हैं

Saturday, 7 December 2013

माँ (दोहे)....


माँ बसती रग-रग में, माँ ममता का सागर|
ले आ चाहे जितनी भर ले, अपने मन की गागर||

स्नेह भरी वो गंगा है, बिन उसके जीवन बेकार|
माँ ममता की सरिता है, निर्मल एक बयार||

चाहे मिलें हज़ार से, मिला ना माँ-सा अपनापन|
माँ का अदभुत प्रेम है, निश्छल जल-सा मन||

ईश्वर अल्लाह पूज के, पंडित भए संसार|
जो ना पूजा मात को, ये सब हैं बेकार||

माँ तो मेरा मूल है, माँ बिन एक ना आधा|
तू जो मेरे संग रहे, दूर रहे हर व्याधा||

हर कष्टों से दूर है रखा, पाला अपना लाल|
पल भर को भी समय निकाल, पूछ ले माँ का हाल||

लड़खड़ाए जब भी, खुद ही संभल गए

लड़खड़ाए जब भी, खुद ही संभल गए
कर याद रोए जब भी, खुद ही बहल गए
यूँ इंतज़ार में बरसों निकल रहे
मौसम बदल रहा, क्यूँ न तुम बदल गए 

है तस्वीर आपकी जो सामने यहाँ
ना दूर जाईये, दिल थामिये यहाँ
हैं संग रंग सारे मिजाज़ आपके
गज़ल लब्ज़ मेरे लब के गाईए यहाँ

इन निगाहों में मैं बस डूबता जाऊं
जिंदगी भूलता जाऊं, इशारे मानता जाऊं
है कुछ दिनों की जिंदगी
मैं गीत गाता जाऊं, मैं गुनगुनाता जाऊं

Tuesday, 3 December 2013

सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर

सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर
बंद पड़े इस खाली मकान में, बोलो कोई रहता है घर ?
सुबह हुई सूरज है आया
और शाम हुई सूरज था आया
दिन-भर खामोश रहा हूँ मैं
चुपचाप यहीं पड़ा हूँ मैं
मेरे संग ये खिड़की बेचारी
भिड्की थी या बंद बेचारी
उसके ऊपर का आला
और दरवाज़े का ताला
मुझसे यूँ पूछें हैं सारे
अब आए हो जब आ गए तारे
दिन भर घर के बाहर रहा ढूँढता सपनों को
बोल कहाँ छोड़ आया अपनों को
सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर 

मैं चौखट हूँ परेशान
कोई ना आया कोई निशान
मैं तेरी प्रियसी का कमरा ना वो खुशबू, अंधियारा है दूना
उनकी उतरी बिंदी बिन देखो शीशा भी है सूना
और टेढ़ा-सा आँगन मुझको आँख दिखाए, डांटे बरबर
सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर 

प्यारी बिटिया की अलमारी, कहती है मुझसे लाचारी
कब आएगी तेरी लाडो, इन कपड़ो की राजकुमारी
खुद ही साइकल उसकी चलती, कहती है मुझको चल-चल के
नन्हे-से वो हाथ कहाँ हैं, कैसे गिर जाऊं साथ कहाँ है
खेल-खुलौने खुद ही हँसते, मुझको रोने भी ना देते
कहते हैं नव्या ले आओ, इतनी खामोशी सोने ना देते
तेरे पानी का थर्मस और छोटा अम्ब्रेला
पूछे है मुझसे, कब तक सूखा रहूँ अकेला
सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर