Wednesday, 27 November 2013

मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की

 
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की
वो बाबुल का आँगन, वो बाबुल की बगियाँ
क्यूँ छोड़ आई वो ममता की नदियाँ
मम्मी के आँचल में चुपके से छिपना
बहुत याद आवे वो छुप के निकलना
मैं रोई चिल्लाई और ये गलियां भी सिसकी
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की
 
वहीं छूटा बचपन, लड़कपन, शरारत
मैं आई पीया घर, कर खुद से बगावत
वो स्कूल जिसमें गई थी मैं पहले
वो रस्ते भी भूले जिसमें खूब टहले
सारी सहेली आईं विदा में
गले लग-लग रोई बस आंसू फिज़ा में
बहुत याद आता, भैया मुस्कुराता
वो दूज का टीका और रखिया उसी की
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की

Tuesday, 26 November 2013

सखी जरा तुम आ जाना

सखी जरा तुम आ जाना पर आके फिर बस मत जाना
आँगन के सूखे फूलों में तुम थोड़ी सुगंध बसा जाना

सुनो जरा खामोश है मौसम, और दिशाएँ सोई हैं
मेरे संग चौखट पे सारी रात ये रोई हैं
इस दूरी को क्या मैं नापूं, मानों प्यास और पनघट है
मेरे संग बस खत वो तेरे, सूखे गुलाब और करवट हैं
सुबह हुई सूरज है आया और लाया उम्मीदों का ताना
सखी जरा तुम आ जाना पर आके फिर बस मत जाना
आँगन के सूखे फूलों में तुम थोड़ी सुगंध बसा जाना...

तुम मेरे शब्दों की मंसा, गीतों में समाई हो
तुम मेरी राधा – सी मूरत, मीरा की चौपाई हो
इन बादलों का रिमझिम टपकना, मेरी तड़प की भावना है
है ये सावन या फिर आंसू, बस तेरे महक की कल्पना है
चाँदनी भी उतर रही है और मैनें भी छोड़ा गीत गाना
सखी जरा तुम आ जाना पर आके फिर बस मत जाना
आँगन के सूखे फूलों में तुम थोड़ी सुगंध बसा जाना

Friday, 22 November 2013

क्या जिंदगी है आज ही या रुकेगी कल कहीं


क्या जिंदगी है आज ही या रुकेगी कल कहीं
तभी रुकेगी जिंदगी जब प्यार को हो पल नहीं
रुको नहीं चले चलो, झुको नहीं चले चलो
जो हार कि फटकार हो फिर जीत कि फसल वहीँ 

नया जोश होश हो, नई उमंग रोज हो
रोष भी समान हो, प्रेम में ही भोज हो
नहीं गिला किसी से अब और मौत से हो दोस्ती
नए बादलों तले नए शितिज कि खोज हो 

इंसान में प्यार से इंसानियत बनाइये
इंसानियत हो फलसफ़ा मजहब नया चलाईये
हो नदी में ज़ोर कितना, पतवार नई चाहिए
गर हों अँधेरे रास्ते बस लौ जलानी चाहिए.... बस लौ जलानी चाहिए

तुम्हारी याद आती है और मैं गुनगुनाता हूँ

तुम्हारी याद आती है और मैं गुनगुनाता हूँ
मुस्कुरा के शायद तुम्हें भुलाता हूँ
तुम मेरे पास हो यही सोच ना रोता हूँ, ना रुलाता हूँ
बस ये तस्वीर जानती है कैसे खुद को सुलाता हूँ

कुछ दर्द होते हैं जिनकी चुभन भी मीठी लगती है
साँस लेता हूँ की ये हवा आज भी महकती है
ऐ चाँद बंद कर अपनी चाँदनी
हमें तो अँधेरे में भी रौशनी लगती है

लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

चल रहा पंथी गगन में गीत गाता
शून्य-सा नभ में भ्रमता-भ्रमाता
सांस चलती है पथिक चलना पड़ेगा
अब हार पर जीत का परचम उड़ेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

देख तेरी इस मायूसी को
सूर्य ने चमकना भुलाया
नभ-चंद्र ने हँसना भुलाया
और भूली चांदनी भी खुद सजाना
मत बना पथिक इन्हें बैठ जाने का बहाना...
जीवन नदी है इसे बस बहना पड़ेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

ये तो बस काले बादल का साया
मत ओढ़ पथिक तम की ये माया
डग डग डग-सा चलता चल
जैसे कल कल-सा बहता जल
कुछ दूर खड़ी बस तेरी छाया
अब तू गगन में ही उड़ेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

हाँ सुना कभी, ‘ईश्वर कण-कण है’
पर मेरा मंदिर मेरा प्रण है
जीना भी क्या कोई रण है ?
पर रण में जीना ही तो प्रण है
हर मंच पे नवरंग के तू रंग भरेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा..... लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

Friday, 15 November 2013

है सूना घरौंदा की बिटिया नहीं है


ये खिलौना है तेरा, ये बिछौना है तेरा
तू नव्या उजेरा, ये बसेरा है तेरा
है सूना घरौंदा की बिटिया नहीं है
है दूना बस रोना की बिटिया नहीं हैं 

तेरा मुस्कुराना, वो रोना फिर हँसना
हँस के, सुबक के, गले मिल के कहना
गुड़िया फिर ला दो ओ पापा तुम प्यारे
नन्ही परी मैं कहते हैं सारे 

दौलत तू ही है, तू है मेरा सृजन
तन - मन तू ही है, तू है मेरा दर्पण
तू नन्ही सी मूरत, शुभ है महूरत
है मासूम देवी, मैं तुझ पर हूँ अर्पण

 ये झूला है तेरा, जो भूला पड़ा है
नहीं आज खाना ये चूल्हा पड़ा है
तेरी फ्रोक पीली, इन नजरों से गीली
तू जल्दी से आ जा की पापा खड़ा है
तू जल्दी से आ जा की पापा खड़ा है

Wednesday, 13 November 2013

मैंने सुना है तुम कल आओगी....


पुरानी किताब और गुलाब की सूखी पंखुरियाँ
मोर पंख में चिपकी मानों हर रंग की परीयाँ
मैंने धीरे से उन्हें सहलाया, थोड़ा पुचकारा
मंद मंद मुस्काके, आँखों के पानी से नहलाया
बोलो कभी तुम भी अपने सिरहाने रखी मेरी तस्वीर में नजरों को बोओगी
भला कब तक सूरज को बंद आँखों से देखोगी...मैंने सुना है तुम कल आओगी.....

 याद है वो कॉलेज का गलीचा
याद है वो आम का बगीचा
हाँ याद है वो नदी का किनारा
याद है वो मिलन का सवेरा
भला कब तक विरह बेला सजाओगी..... मैंने सुना है तुम कल आओगी.....

 कल आईं थी फिर तुम याद की चौखट पे
हाँ उसी पहाड़ी, उसी पेड़ की छाँव और गाँव की पनघट पे
मैंने सितारों को भी रोक रखा था तुम्हारे स्वागत में
पर तुम चुपके से छू के चली गई प्यार की बनावट में
भला कब तक मेरी छुअन को ना धोओगी.... मैंने सुना है तुम कल आओगी.....